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ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान “ग़ालिब”

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ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़ ये तेरा  बयान “ग़ालिब”
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता
मसाइल=छुपी मान्यता, Mysterious or hidden doctrines;   तसव्वुफ़=सूफी विचारधारा;   वली=ख़ुदाका दोस्त;    बादा-ख़्वार=शराब का मज़ा लूटनेवाला

अर्थ:ग़ज़ल के आख़िरी शेअर को मक़्ता कहते हैं। इस शेअर में शायर अपना तख़ल्लुस शामिल करता है और ख़ुद की अज़मत और बुलंदी बयान करता है। इस शेअर में ग़ालिब कहता है ए ग़ालिब तसव़्वुफ के बारीक ओर पेचीदा मसाइल को तू ने इस ख़ूबी से बयान किया है। ये ऐसे मसाइल हैं । अगर तू बादाख़वार ना होता तो हम तुझे वली समझते। कहते हैं जब बादशाह ने ये मक़ता सुना तो फ़रमाया कि हम तो जब भी ऐसा ना समझते। मिर्ज़ा ने कहा । हुज़ूर तो अब भी ऐसा ही समझते हैं मगर ये इस लिए है कि में अपनी वलाएत पर मग़रूर ना हो जाऊं। 

शेअर की खूबियां:- जो वली हें वह शराब नहीं पीते और जो शराब पीता है वह वली नहीं हो सकता। लेकिन ग़ालिब दो मुतज़ाद या contradictory चीज़ें एक साथ होना चाहता है । ख़ुदाकी ही शान है कि वह ज़ालिम भी है और रहीम भी। जान लेनेवाला भी है और जान देनेवाला भी। शायद ग़ालिब केह हा है, अगर ख़ुदा एकसाथ दो मुतज़ाद या contradictory चीज़ें हो सकता है तो ग़ालिब जैसा इन्सान क्यों नहीं? 

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