हैफ़! उस चार गिरेह कपड़े की क़िस्मत, ग़ालिब जिसकी क़िस्मत में हो, आशिक़का गिरेबां होना

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 हैफ़! उस चार गिरेह कपड़े की क़िस्मत, ग़ालिब
जिसकी क़िस्मत में हो, आशिक़का गिरेबां होना
गिरेह=गांठ   चार गिरेह=चार गांठ के बराबर

तशरीह: इस चार गृह कपड़े की क़िस्मत पर अफ़्सोस है जो बदक़िस्मती से आशिक़ का गिरेबान बन गया। केवनका वो जुनून-ए- इश्क़ के हाथों हमेशा तार तार रहेगा। वस्ल में माशूक़ अज़ राह-ए- ख़ुशी चाक देगा और हिज्र में आशिक़ ख़ुद इस की धज्जियां उड़ा देगा। आब-ए-हयात में लिखा है कि जब ग़ालिब क़मारबाज़ी के जुर्म में कैद थे तो कपड़े इस क़दर मेले हुए कि जूऊएं पड़ गएं। जिस दिन कैद से छोटे कुरता फाड़ कर वहीं फेंक दिया और इस मौका-ए- पर येह शेअर पढ़े

शेअर की खूबियां: ग़ालिब अक्सर अपने शेअर के दो मिसरों में एक कहानी कह देता है । हज़रत यूसुफ़ और ज़ुलेख़ा का क़िस्सा मशहूर है। हज़रत यूसफ़ के सौतेले भाई आप को बहाने से घूमने ले गए और कनोएं में फेंक दिया। वहां से गुज़र ने वाले एक कारवाँ ने उन्हें पाया और मिस्र ले गए। -वहां फ़िराओन के महल में ग़ुलाम के तौर फ़रोख़्त कर डाला। हज़रत यूसुफ़ जवान और अज़हद हसीन थे। फ़िराओन के वज़ीर अज़ीज़ की बीवी ज़ुलेख़ा को आप भा गए और इश्क़ का ग़लबा तारी हो गया। ज़ुलेख़ा हज़रत यूसफ़ के इश्क़ में पागल हो गईं। एक दिन जोश-ए-इश्क़ में ज़ुलेख़ा ने महल की गुज़रगाह में यूसुफ़ लिपट पड़ी। यूसफ़ उसे छुड़ाने गए। कश्मकश में यूसफ़ का गिरेबान चाक हो गया। ज़ुलेख़ा ने अपनी आबरू बचाने के लिए ख़ुद कपड़े फाड़ डाले और इल्ज़ाम लगया कि हज़रत यूसुफ़ ने जब्र किया। हज़रत यूसुफ़ को क़ैदख़ाने में डाल दिया गया। एक अर्से के बाद इन की सुनवाई हुई। क़ाजी ने फैसला सुनया। चूकिं क़मीस पीछे की तरफ़ फटी थी इस का मतलब येह हुआ कि हज़रत यूसुफ़ भाग रहे थे और ज़ुलेख़ा ने उन्हें पीछे से गिरफ़्त किया। हज़रत यूसुफ़ को बा इज़्ज़त बरी कर दिया गया। इस वाक़ीए को कईं हज़ार साल गुज़र गए हैं। ज़ाहिर है कि हज़ारों साल से गिरेबां की क़िस्मत में चाक होना लिखा है। इस सानिहे पर ग़ालिब अफ़्सोस करता नज़र आता है।

माहिरीन-ए- ग़ालिब की राय: हसरत: शेअर तो बहुत खूब है लेकिन दोनों मिसरों में तकरार ने बे लुतफ़ी पैदा कर दी है

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