सादगी व पुरकारी, बेख़ुदी व हुशयारी

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सादगी व  पुरकारीबेख़ुदी    हुशयारी
हुस्नको तग़ाफ़ुलमें, जुरअ॔त आज़मां पाया
सादगी=भोलापन पुरकारी=चालाकी   बेख़ूदी=बेपरवाई   हुशयारी=ख़बरदारी   तग़ाफ़ुल=गफ़लत   जुरा॔त=हिम्मत आज़मां=परखने वाला, आज़माइश करने वाला

तशरीह: हसीनान-ए-जहाँ देखने में बड़े सादा-ओ-गफ़लत शआर नज़र आते हैं लेकिन इन के भोलेपन परना जाना चाहीए। वो हक़ीक़तन बड़े अय्यार और हुशियार हैं। और उनकी सादगी और तग़ाफ़ुल-शआरी महिज़ इस लिए है कि वोह अपने चाहने वालों की हिम्मत को आज़माऐं और देखें कि आशिक़ कितने पानी में हैं । या कितनी मुहब्बत रखते हैं।

माहिरीन-ए-ग़ालिब की राय:
हसरत की राय: अहल-ए-हुस्न की ज़ाहिरी सादगी और पुरकरी से मतलब ये होता है कि अपने आशिकों की जुरअ॔त को आज़माऐं और ये देखें कि, इन को सादा समझ कर, चाहने वाले गुसताख़ी की हिम्मत तो नहीं करते। इस से ज़ाहिर है कि इस क़िस्म की सादगी को दर हक़ीक़त पुरकारी, और बेख़ुदी को हुशयारी समझना चाहीए

बेख़ुद और तबा तबाई: कैसे पेचीदा ख़्यालको किस ख़ूबी से ग़ालिब ने ब्यान किया है! नशिस्त-ए-अलफ़ाज़ की तारीफ़ नहीं हो सकती। माशूक़ों का भोलापन इस लिए हुआ करता है कि आशिकों का दिल देखे । दर हक़ीक़त येह भोलापन ख़ास हुशयारी और ऐन चालाकी है।

शेअर की खूबियां: तसव्वुर कीजीए कि माशूक़ जलवा नुमा है और इस के लहराते हुए गेसू, शरारत भरी नज़र, और बिजली गिराने वाली मुसकान लिए बे ख़बर है। ग़ालिब के दिल में एक तूफ़ान है कि ऐसे में जाकर उसे छू ने की गुसताख़ी करना आसान होगा। लेकिन फिर कहता है कि माशूक़की सादगी महिज़ धोका है । ग़ालिब हमें भी आगाह करता है कि हुस्न अगर ग़ाफ़िल हो तो भी हमें गुसताख़ी करने से बाज़ रहना चाहीए। अगर शेअर को इश्क़-ए-हक़ीक़ी के नज़रये से समझें तो येह कि, ख़ुदा जो माशूक़-ए-हक़ीक़ी है और हमें ग़ाफ़िल नज़र आता है और हम बदकारी के काम अंधेरे या उजाले में कर लेते हैं। कभी ऐसा लगता है कि ये मौक़ा फिर नहीं आएगा और हम से जो नहीं करना चाहीए वो जुरात और गुसताख़ी हो जाती है। ग़ालिब कहता है अल्लाह ग़ाफ़िल नहीं वो हर बात और निय्यत को जानता है। उसे सिर्फ हमारी आज़माइश मंज़ूर है। इस शेअर में ग़ालिब ने तज़ाद वाले अलफ़ाज़का इसतेमाल किया है। मसलन सादगी, पुरकारी, बेख़ुदी और हुशियारी

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