वाए दिएवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझ को आप जाना उधर, और आप ही हैरां होना

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येह ग़ालिबकी १८वीं ग़ज़ल का शेएर नंबर ४ हे। बहुत ही ख़ूबसूरत शेएर हे।

 वाए दिएवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझ को
आप जाना  उधर, और आप  ही  हैरां होना
हरदम=हर सांस पर, हर घड़ी   वाए=अफ़्सोस   अज़ बसका = बहुत ज़्यादा   देवानगी-ए-शौक़ = जुनून-ए-इश्क़  उधर=माशूक़ की तरफ़

तशरीह: मुझे अपने इश्क़ के दीवाना पन पर अफ़्सोस आता है कि इस के तक़ाज़े से में बार बार तेरी तरफ़ जाता हूं और फिर आप ही आप हैरान-ओ-परेशान हूं कि मैंेहां क्यों आएआ , तुझ तक रसाई तो मुमकन ही नहीं। यानी येह इश्क़ का जुनून था कि तेरे कूचे में हज़ारबार आए और हज़ारबार नाकाम लौट आए। शेअर की खूबियां: दीदार की तमन्ना में माशूक़ की गली के चक्कर लगाना ग़ालिब ने अजब अंदाज़ में बयान किया है। वो बयान करता है कि किस तरह वो माशूक़ के मिलने के ख़ाब और जो हकीकत कि इस का मिलना नामुमकिन है, में घिरा हुआ है। उसकी बेचारगी हमारे दिलों को छू जाती है। मौजूदा ज़माना में कुएं मद्दाह अपने चहेते अदाकारों (Hero-Heroin) की झलक पाने के लिए इन की गली के चक्कर लगाते हैं और नाकामयाब लौट आते हैं। जो fans भी दीवानगय-ए-शौक़ में हरदम उधर जाते हैं और हैरान लौट आते हैं। इस शेअर में ग़ालिब ने हर दम लफ्ज़ इस्तामाल किया है। इस का मतलब हर घड़ी होता है और हर सांस भी होता है। अगर हम हर दम को हर सांस का मफ़हूम समझे तो शेअर इश्क़-ए- हक़ीक़ी के दाइरह-ए- में चला जाता है, जो हसब-ए-ज़ैल हैं।

माहिरीन-ए-ग़ालिब की राय: तबा तबाई की राय:- यानी हर सांस लेने से में इस मबदा हयात -ओ- वजूद की तरफ़ दौड़ता हूं और अपनी नारसाई से हैरान हो कर रह जाता हूं

बे ख़ुद की राय:- बार बार माशूक़-ए- हक़ीक़ी का मुशताक़-ए- जमाल हो कर अपनी ख़ूदी से गुज़र जाता हूं और नारसाई की वजह से हैरान हो कर सोचता रह जाता हूं कि में कहां और इस का दीदार कहां?

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