बसके दुशवार है, हर कामका आसां होना आदमीको भी मुयस्सर नहीं इन्सां होना

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ये ग़ालिब की १८वीं ग़ज़ल के शेअर नंबर १ और २ हैं। बहुत ही खूब सूरत अश्आर हैं
बसके दुशवार है, हर कामका आसां होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इन्सां होना
बसके=अज़ बसके=बहुत ज़्यादा  इन्सां होना=हक़ीक़ी मानी में इन्सानी पैदा करना  मुयस्सर=मिलना, हासिल होना

तशरीह: इस दुनिया में सब मुश्किल ही मुश्किल है। कोई काम आसान नहीं है। एक सादी सी बात को देखिए। हालानका हम इन्सान हैं और इस मुक़ाम से इंसानियत सिर्फ एक जुसत है फिर भी हमें सच्चे इन्सान होना मुएस्सर नहीं। शेअर की खूबियां: मुख़ालफ़ अलफ़ाज़ दुशवार और आसां; आदमी और इन्सां बख़ूबी इस्तेमाल हुए हैं। माहिरीन-ए-

ग़ालिब की राय: हाली: “बादी उल-नज़र में एक मामूली बात मालूम होती है लेकिन ग़ौर से देखा जाए तो एक अछूता ख़याल है। दावा ये है कि दुनिया में आसान से आसान काम भी दुशवार है और दलील ये है कि आदमी जो ऐयन इन्सान है इस का भी एयन इन्सान बनना मुश्किल है।

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