कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीम कश को ये ख़लिश कहां से होती, जो जिगरके पार होता

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कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीम कश को
ये ख़लिश कहां से होती, जो जिगरके पार होता
शिकस्तातीर-ए-नीम कश = वो तीर जिस को आधी कमान खींच के यानी आहिस्ता से छोड़ देव जाय। मुराद , तीर-ए-मिझ़गां, जिसे कमान-ए-चशम से पूरे ज़ोर से नहीं, नीम वा चशम से छोड़ा गया है  ख़लिश= चुभन

तशरीह: आँखों के पपोटों के किनारों पर जो बाल होते हैं उसे मिझ़गां कहते हैं। इन बालों को, चूँकि वो सख़्त और चुभन वाले होते हैं, शायर उसे तीर तसव्वुर करते हैं, और भौं के क़ौस को कमान। एक तीर अंदाज़ अपने शिकार पर जब तीर फेंकता है तो पूरी कमान खींच कर, ता कि वो शिकार के बदन के पार निकल जाए। अगर कमान को आधा खिंचा (नीम कश) हो तो वोह शिकार के जिस्म में अटक जाएगा और शिकार चुभन और शदीद दर्द महसूस करेगा और तड़पने लगेगा। लेकिन एक सच्चे आशिक़ को तड़पने में मज़ा आता है। इस लिए ग़ालिब कहता है कि वोह तीर-ए-मिझ़गां जिसे तू ने कमाल बे परवाही के साथ नीम कश कमान-ए-चशम से मेरे जिगर पर मारा है, इस की कैफ़ीयत मेरे दिल से दरयाफ़त करले यानी मुझे इस से बहुत ही लुतफ़ हासिल हुआ है। अगर तू उसे पूरे ज़ोर से छोड़ता तो वो जिगर के पार हो जाता और इस तरह लिज्ज़त-ए-ख़लिश से महरूम रह जाता मतलब ये कि काम तमाम होने में लुतफ़ नहीं । ख़लिश में ज़्यादा लुतफ़ है। इस लिए ग़ालिबने तीर-ए-नीम कश की तारीफ़ की है ।

माहिरीन-ए-ग़ालिब की राय
बेख़ूद माशूक़ तीर-ए-नीम कश से शरमाता है। क्योंकि तीर अंदाज़ी के मेआर या कसौटी पर कमतर है। मिर्ज़ा साहिब  ने इस की तारीफ़ कर के माशूक़ की शर्मिंदगी दूर करते हैं

तबा तबाई शेअर के दूसरे मिसरे में लफ़्ज़ “जो” है इस का वाओ (و) वज़न के हिसाब से साक़ित (अनुच्चारित) है यानी वाओ ( و) पर ज़ोर कम है और ये दुरुस्त ही नही बल्कि सुंदर है। लेकिन इस के अनुच्चारित हो जाने से दो जीम (ج) या दो ज-ज हो गये हें याने के ज-ज जमा हो जाने से कठोरता पेदा हो गइ हे. ये ख़ूबी-ए-मज़मून है, कि ऐसी बातों का कोई ख़्याल नहीं करता।

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