कहूं किस से में के क्या है? शबे ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता

This post is also available in: English Urdu ગુજરાતી

ये ग़ालिब की २१वीं ग़ज़ल के शेअर नंबर ११ हैं। ये ग़ज़ल बहुतही शौहरत-ए-याफ़ता हे, अशआर भी इतनेही मशहूर हैं।

कहूं किस से में के क्या है? शबे ग़म बुरी बला है
मुझे  क्या बुरा था मरना, अगर  एक  बार होता
शबे ग़म=विरह की रात; बला =मुसीबत, आपदा, क़हेर

अर्थ: इस शेअर में ग़ालिब वाक़िया बयान करता है। माशूक़ ने मिलने का वाअदा किया है ग़ालिब महबूब के आने के इंतिज़ार की घड़ियां गिन रहा है । हर पल सदीयों जितनी लंबी लगती है। अपनी हालत बयान करने के लिए अलफ़ाज़ तलाश कर रहा है। कहता है में किस कहूं कि शब-ए-ग़म या हिजर/विरह की रात किया है। हासिल ये है कि शब-ए-ग़म बहुत ही बड़ी मुसीबत है। इस में इंसान बारबार मौत की तकलीफ़ उठाता है और फिर भी नहीं मरता। अगर में एक दफ़ा मे मर जाता तो मुझे इस अज़ाब से नजात मिल जाती ।

शेअर की खूबियां: ग़ालिब ने विरह की रात की मुसीबतों को मौत से ज़्यादा बताया है

This post is also available in: English Urdu ગુજરાતી