कहते हो “ना देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया”

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कहते हो ना देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहां कि गुम कीजे? हमने मुद्दा पाया
मुद्दा = मतलब  मुद्दा पाया = हम तुम्हारा मतलब समझ गए

तशरीह: बच्चे अपने दोस्तों की चीज़ें छुपा ने का खेल खेलते हैं। अगर किसी की गुमशुदा चीज़ किसी को मिल जाती है तो वोह छेड़ने के लिए कहता है गर हमें मिल गई तो हम नहीं देंगेऔर अगर किसी चीज़ को लेने की निय्यत होती है तो अज़ राह-ए-शोख़ी उसे छिपा देते हैं और कहते हैं अगर तुम्हारी चीज़ हमें मिल गई तो हम नहीं देंगे यही मासूमाना शोख़ी इस शेअर में है। कि महबूब दिल उड़ा कर आशिक़ से कहता है अगर हमें तुम्हारा दिल कहीं पड़ा हुआ मिल गया तो हम नहीं देंगेआशिक़ कहता है कि मैं समझ गया। दिल तो तुम्हारे ही पास है। अगर मेरे पास होता तो भी में उसे ऐसी जगह फेंक देता जहां तुम देखलो और चुरा लो। इस शेअर में ग़ालिब अपनी आशिक़ी की अज़मत बताना चाहता है कि वो आशिक़ों में मजनूं, फरहाद, रोमीयो, रांझा, और वामिक़ से भी अव्वल है। वो कहना चाहता है कि ख़ुद तो एक पैदाइशी आशिक़ है। बचपन में ही इस का माशूक़ दिल चुरा लेता था और फिर सताने कि लिए कहता था अगर हमें मिल गया तो हम नहीं दें गे। शेअर की खूबियां: ये ग़ज़ल का पहला शेअर है । किसी भी ग़ज़ल के पहले शेअर को मतला (उगने वाला) कहते हैं। मतला लफ्ज़ अरबी लफ्ज़ तुलूअ से निकाला है तुलूअ के मानी उगना है जैसे सूरज तलूअ हुआ। मतला के दोनों मिसरों में रदीफ़ (आख़री लफ्ज़) होता है जैसे इस शेअर में लफ्ज़ “पाया” है। इस लिए मतला मौसीक़ी से पुर लगता है।

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